रविवार, 18 जुलाई 2010

मेरी बात-1

मैं क्या करता, मेरे पास सिर्फ एक कलम थी। मुझको उसी के सहारे जिन्दा रहना था। लेकिन समाज के भ्रष्ट लोग मेरी कलम मुझसे छीन लेना चाहते थे।मैं जब भी कोई अख़बार में काम शुरू करता , भ्रष्ट लोग मेरे पीछे पड़ जाते। मैं बार बार बेरोजगार हो जाता। लेकिन मेरी कलम ने मुझको कभी भूखों नहीं मरने दिया। जब भी कोई मुझे हानि पहुँचाना चाहता , मां सरस्वती की कृपा से, मुझको एक नई विधा मिल जाती और मेरी आजीविका चलती रहती। मैं ईश्वर की इस कृपा के लिए उनको धन्यवाद देता हूँ।
३० मार्च, १९८० की बात है, शाम के समय मैं एक पत्रकार के रूप में पूर्व विधायक जहूर अली के निवासस्थान पर गया था। वहां चुनाव सम्बन्धी एक बैठक का आयोजन था। बैठक का मुद्दा था - विधान सभा चुनाव के कांग्रेसी उम्मीदवार ज्ञानरंजन का असली नाम क्या है? हुआ ऐसा था क़ि उर्दू में छपा एक परचा किसे ने मुस्लिम इलाकों में बांटा था , जिसमें दावा किया गया था क़ि कांग्रेसी उम्मीदवार का असली नाम विजयरंजन है, जिसे एक बार शहर में दंगा करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।
अनेक वक्ताओं ने दलील दी की क़ि वह पर्चा झूठा है, लेकिन कुछ लोग जोर देने लगे क़ि यह ज्ञानरंजन की जिम्मेदारी है क़ि वह विजयरंजन को यहाँ उपस्थित करें। उसी समय जहूर अली जी ने मेरी और मुखातिब होते हुए कहा - जनाब, आपके सामने दिलीप जी हैं। ये जनाब रांची के वासिंदे हैं, पत्रकार हैं, हम इनसे ही कहते हैं क़ि वे सच्चाई को सामने रखें।
मैंने बैठक में उपस्थित लोगों के अनुरोध पर बताया क़ि ज्ञानरंजन और विजयरंजन दो बिलकुल अलग व्यक्ति हैं। विजयरंजन पटना में रहते हैं और वहां से लोक आस्था नाम का एक अख़बार प्रकाशित करते हैं।
दुसरे दिन मुझे उस अख़बार से नाता तोडना पड़ा जिससे main sambandhit था , क्योंक़ि परचा जिस पत्रकार ने लिखा था वह मेरा बौस था। वह एक स्वतंत्र उम्मीदवार जगन्नाथ प्रसाद चौधरीजी का समर्थन कर रहे थे, क्योंक़ि उनके एक मित्र रोशन लाल भाटिया भी चुपके चुपके चौधरी जी की मदद कर रहे थे। वह अख़बार बीजेपी समर्थक था, लेकिन उस अख़बार में मेरे बौस की दादागिरी चलती थी। उनका फरमान था क़ि बीजेपी उम्मीदवार श्री मित्रा के बारे में एक भी समाचार नहीं प्रकाशित किया जाये।
मैं बेरोजगार हो गया था। ३१ मार्च को ही मेरी बेटी सारिका का जन्म हुआ था। बेटी के लिए दूध जुटाना मुश्किल हो गया था। लेकिन जब वही तानाशाह पत्रकार साहेब उस पत्र से अपने द्वारा दिए गए इस्तीफे पर अख़बार से हटा दिए गए तो उनहोंने प्रेस कांफेरेंस कर कहा क़ि उनको रोड पर ला खड़ा किया है, प्रबंधन ने।
खैर, पत्रकार महोदय की दादागिरी मेरे लाभ में रही। मुझे पटना में दैनिक आर्यावर्त में काम मिल गया। जिन्द्गगी फिर पटरी पर आ गयी। लेकिन मैं जान गया था क़ि आर्यावर्त में भी में ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाऊंगा। सो मैं कार्टून और कहानी विधाओं पर काम करने लग गया। और मेरी मेहनत ने रंग दिखाया। अब मुझको आजीविका क़ि चिंता नहीं रह गई थी।
मैंने जनहित में आजीवन लिखने का संकल्प लिया। आज मेरी कलम ने मुझको जितना दिया है, उससे मैं संतुष्ट हूँ।
जैसा क़ि मैं जनता था क़ि आर्यावर्त में भी मैं ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाऊंगा, वैसा ही हुआ। एक राजनेता ने अपनी दादागिरी दिखला दी और मैं फिर बेरोजगार हो गया था। लेकिन इस बार मेरी कलम अपना कार्य कर रही थी। फिर मैंने आज समाचारपत्र में काम करना शुरू किया। यहाँ प्रबंधन और पत्रकारों का एक समूह मेरे खिलाफ हो गया और मुझे रांची से पटना आज में जाना पड़ा। वहां भी रांची में खार खाए लोंगों ने मुझे अपदस्थ करने का प्रयास जारी रखा। वे सफल भी हो गए।
लेकिन अब मुझे किसी अख़बार में काम करने और न करने से कोई फर्क नहीं पड़ता था।बाद में मुझे डाल्टेनगंज के एक अख़बार में सहायक संपादक का पद मिला। लेकिन संपादक महोदय के पास हिन्दी का अलग व्याकरण था। उनको 'कृपया' लिखने नहीं आता था। उनके लिखे लेख और समाचार हास्यरस पैदा करते थे। लेकिन उनकी पीठ पर मेरे बड़े भाई विनोद जी का हाँथ था। मैं उस अख़बार से भी सिर्फ तीन माह में चलता हो गया।
आज भी मेरे पास संपादक महोदय द्वारा लिखित आलेखों क़ि प्रतियाँ मौजूद हैं।
फिर मैंने किसी समाचार पत्र में जाने की कोई जोरदार कोशिश नहीं की, फिर भी मैं आज अपनी आजाद कलम के साथ पत्रकारिता कर रहा हूँ।
मेरे द्वारा रचित साहित्य के लिए मुझे झारखण्ड रत्न से नवाजा गया। मैंने हजारों लेख लिखे जिनको बड़े अख़बारों ने प्रकाशित किये। मेरे द्वारा लिखित कहानियों, नाटकों और कविताओं को भी बहुत सम्मान मिला। मेरे द्वारा रेखांकित कार्टूनों ने भी खूब धूम मचाई।जारी.....